पीरियड्स के मिथक को तोड़ती ये वुमिनिया

कल अक्षय कुमार की फिल्म आ रही है पैडमैन। फिल्म आने के पहले मीडिया जगत से लेकर सोशल साइट्स पर फ़िल्म की खूब चर्चा हो रही है। क्योंकि आजतक इससे पहले इतने गंभीर मुद्दे पर कोई फ़िल्म नहीं आयी।कहानी है कोयम्बटूर के मुरुगन्नाथम की जिन्होंने सैनेटरी नैपकिन बनाने की सस्ती मशीन बनायी है। ये तो हो गई फिल्म की बात, डिटेल चर्चा कल फिल्म देखने के बाद करूँगी। फिल्म आने के पहले सोशल साइट्स पर इस पर बहस शुरू हो गयी है।कइयों का मानना है कि इस टॉपिक पर खुलकर चर्चा नहीं होनी चाहिए। कुछ बातें पर्दे के पीछे ही अच्छी लगती है।लेकिन समाज का एक तबका ऐसा भी है जो इस टैबू से निजात पाना चाहता है।इनकी समस्यों पर बेबाकी से लोग अपनी राय दे रहें है।अच्छी बात तो ये है कि इस पर महिलाओं के साथ पुरूष भी आगे बढ़कर लोगों के मिथक को दूर करने में लगे है। यह अच्छी पहल है क्योंकि लड़कियों की प्रॉब्लम की बाते सिर्फ लड़कियां ही करें अच्छा नहीं लगता।

पहले का दौर और था जब पीरियड्स आने पर एक कमरे में बंद कर दिया जाता था जैसे उसने कोई पाप कर दिया हो और कुछ भी न छूने के उपदेश के साथ चुपचाप किसी कोने में पड़े रहने को कहा जाता। मानों उसे कोई गंभीर बीमारी हो लेकिन जैसे-जैसे समय बदलता गया लड़कियों के सोच में भी परिवर्तन आया है वो सोशल प्लेटफॉर्म पर अपनी बातों को लोगो तक पहुँचाना चाहती है पीरियड्स एक नेचुरल प्रक्रिया है यह कोई बीमारी या समस्या नहीं है और ना ही छुआछूत है जिसे छुपाने की जरूरत हो। ये तो महिलाओं को एहसास कराता है कि वो जगत जननी है उनसे ही आने वाला कल है उनसे ही समाज का अस्तित्व जुड़ा है। सभी महिलाओं को इस प्रक्रिया से हर महीने गुजरना पड़ता है।पीरियड्स में कुछ लड़कियों को असहनीय पीड़ा होती है जिसे शर्म के कारण अपने परिवार वालों को शेयर नहीं पाती। जो भविष्य के लिए घातक होता है। यह विषय केवल दर्द और दाग तक ही सीमित नहीं है फिल्म के ही बहाने सही लेकिन वक़्त आ गया है इसे हउआ न बनाकर इस बात को खुलकर अपने फैमिली और फ्रेंड्स के सामने रखा जाये। लोगों के मन में इसे लेकर जो भ्रांति और मिथक है उसे दूर कर गलतफहमियों को दूर किया जाए। हम जिस बात को जितना छिपाते है सामने वालों को उस बात को जानने की उतनी ही जिज्ञासा होती है। घर के लड़कों और दोस्तों के सामने इस मिथक को दूर कर आजकल हो रही समस्यों पर चर्चा की जाये तो शायद समस्या का हल निकल पाये।जरूरत है इस मुद्दे को टैबू न बनाकर नॉर्मल टॉपिक की तरह बातें की जाये ताकि लड़के भी अपने घरों में महिलाओं को समझ सकें उनके मूड स्विंग को समझ सके। क्योंकि इन चार दिनों में मूड में काफी बदलाव आता है।

इनदिनों सोशल साइट्स पर कैम्पेन चलाया जा रहा है सेल्फी विथ पैड। आज की एजुकेटेड लड़कियां इसका हिस्सा बन रही है गांव और शहरों में मुहिम भी छेड़ रखा है औरअच्छी बात यह है कि लड़के भी इसका हिस्सा बन, लोगों को जागरूक करने का काम कर रहे है। पीरियड्स से जुड़ी बातों को सोशल साइट्स पर बेझिझक रख रहे है। इनका मानना है फिल्म के बहाने ही कम से कम हम इस मुद्दे पर बात कर सकते है

बिहार के टीचर और लड़के भी इस मुहिम का हिस्सा बन रहे हैं जिन्हें लगता है घर हो या क्लास की पाठशाला सभी जगह ऐसा माहौल होना चाहिए जिसे लड़कियां फ्री महसूस कर सके और लोगों तक अपनी बातों को पहुँचा सके। इनसभी का मानना है एक शिक्षक के तौर पर और एक नागरिक के तौर पर हमारा ये कर्तव्य है कि समाज में इस टैबू को दूर कर बच्चों के मन में सही तरीके से पीरियड्स के बारे में बता कर भय को दूर किया जाये।

मेरे लिए पीरियडस का हर महीने सहज रूप से आना किसी जश्न जैसा है। ऐसा इसलिए क्योंकि इसकी अनियमितता और उससे जुड़ी समस्याओं से भी मैं दो-चार हो चुकी हूं। यह एक नेचुरल प्रक्रिया है जिसका समय से होना मेरे स्वस्थ होने का मुझे प्रमाण देता है। मैं हमेशा से इस विषय को लेकर बेहद संवेदनशील रही हूं मीडिया इंडस्ट्री में कार्य करने के साथ- साथ आज एक शिक्षिका भी हूँ और मुझे इस विषय पर बात करने में कभी झिझक महसूस नही हुई है। चाहे वो मेरे लड़के दोस्त हों, बॉस हो, जूनियर हो, कलीग हो या मेरे छात्र ही क्यों ना।
मेरे लिए पीरियड्स हमेशा से पीरियड्स है, माहवारी है। इसे जब कोई महिला या पुरुष कोड वर्ड में “उन दिनों में” “खराब समय” “वो पांच दिन” या “तबियत ख़राब” होने जैसी संज्ञा देता है तब मुझे यह महसूस होता है कि लोग इसे मिथ के रूप में देखते हैं।मेरे लिए वो मेरे पांच सबसे खास दिन है जब मुझे खुद पर गर्व करने का मन होता है कि मुझे प्रकृति ने इस खूबसूरत चिझ से नवाजा है। हाँ पीरियड्स के दौरान मैं खुद को सहज महसूस करती हूं और मुझे इससे कोई प्रॉब्लम नहीं है- रचना सिंह

बचपन से ही इस टॉपिक पर ज्यादा बात न करने की नसीहत दी गई। जैसे- जैसे बड़ी होते गई ऐसा लगा ये तो कोई गंभीर बीमारी नही है जिसे छुपाया जाये। इस पर लोग बात क्यों नहीं करना चाहते है। क्लास में मेंसुरेशन चैप्टर को गुरुजी ऐसे मुहँ लटका कर पढ़ाते थे जैसे उन्हें ही कोई गंभीर बीमारी हो। लेकिन आजकल के जमाने में बच्चों को सही तरीके से बताना चाहिए ताकि वो गलत भावना से दूर रह सके।मैं अपने घर वालों और ससुराल वालों के सामने आसानी से पीरियड्स जैसी विषयों पर बात कर सकती हूं।- सोनम सिंह

 एक शिक्षक के तौर पर मैं बच्चों के सामने क्लास में भी इस टॉपिक को ईजिली हैंडल करती हूँ। मेरे घर में पापा भाई की ऐसी मानसिकता रही है कि मैं उनसे बेझिझक बात कर सकती हूं। यह एक नेचुरल प्रक्रिया है हर इंसान का बॉडी स्ट्रक्चर अलग-अलग होता है। किसी-किसी को इसमें बहुत दर्द और तकलीफ होती है । जिन लड़कियों को प्रॉब्लम होती है वो खुलकर गार्जियन से अपनी दिक्कत को शेयर करें।- कल्पना सिंह

इस मुहिम में लड़के भी लड़कियों के साथ है और उनका मानना है कि इसपर आसानी से स्कूल,कॉलेज और सोशल प्लेटफॉर्म पर इसकी चर्चा होनी चाहिए।

बचपन से ही मैं औरतों के ज्यादा करीब रहा हूं चाहे माँ हो या बड़ी मां या दादी या बहन। कई लड़कियां दोस्त हैं लेकिन फिर भी मुझे स्कूल की बायोलॉजी क्लास के अलावा कही भी menstruation या पीरियड्स शब्द सुनने को नही मिला। स्कूल में लड़के दोस्त लड़कियों का मजाक बनाते तब भी नही समझ पाता था कि यह है क्या।हालांकि मेरी महिला दोस्त काफी थी पर कभी झिझक में पूछा नही की ये क्या है क्यों है।
बहुत बाद में जब एक बार मेरी दोस्त को पीरियड्स के दौरान दर्द और परेशानी महसूस हुई तो झिझकते हुए ही बहुत पूछने पर उसने बताया कि क्या दिक्कत है और मैं जान सका और फिर मुझे सच मे ये क्या है ये समझ आया।
ये सहज है और मुझे लगता है कि औरत को औरत होने का एहसास कराता है।मुझे बुरा लगता है जब कोई लड़की इससे जूझती है झिझकती है। इसे टैबू न बनाए हौआ न बनाए।पीरियड्स नॉर्मल है।इसे नॉर्मल रहने दे।- रवि राजन

आम “मिडिलक्लास” परिवारों से परे हमारे घर मे शुरू से ही इन टॉपिक्स को “टैबू” नही समझा गया, जिसका श्रेय मेरे पिताजी के प्रोग्रेसिव सोंच और कुछ नया सिखाने के जज्बे को मैं देना चाहूंगा। कई बार बहनों के पैड्स खत्म हो जाने पर मम्मी मुझे ही बाजार भेज मंगवाती थी, दुकानदार भले ही उसे पेपर से ढक कर ऐसे देता था मानो “एटम बम” दे रहा हो।लेकिन फिल्म के ही बहाने आज मौका मिला है इस मिथक को दूर कर सोशल साइट्स और लोगों तक अपनी विचार खुली मानसिकता के साथ जाहिर करेंगे।मुझे खुशी है कि एक लड़के के तौर पर मैं इस मुद्दे पर बेबाकी से अपनी राय दे सकता हूं क्योंकि समय आ गया है डरकर नहीं डटकर इसका सामना किया जाये।- पीयूष

जरूरत है संकुचित मानसिकता से बाहर निकल कर पीरियड्स से होने वाले प्रॉब्लम पर विचार करने की ताकि हमारे घर की महिलाओं को उनकी समस्याओं को छुपाना न पड़े वो इसे सहज तरीके से आपको बता सके।

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