पैडमैन पीरियड्स टैबू को चिढ़ाती हुई फिल्म है

padman movie review jb
मेरे लिए सुबह उठकर फिल्म देखने जाना वैसा ही है जैसे बिना सीढ़ी के तीन मंजिला चढ़ जाना।

वैलेंटाइन वीक में जब आप फ़िल्म देखने जाये तो आप शक के घेरे में आएंगे ऊपर से संयोगवश बैग में पड़े हुए खुद के चॉकलेट को खाकर चॉकलेट डे सेलिब्रेट करना अच्छा एक्सपेरिएंस था।

अब बात पैडमैन फ़िल्म की करते है इस फिल्म की बहुत जरूरत थी और समय भी बिल्कुल सही चुना गया।

फिल्म की शुरुआत होती है लक्ष्मीकांत चौहान (अक्षय कुमार) और गायत्री (राधिका आप्टे) की शादी के साथ-साथ बजने वाला गाना आज से तेरी, जो कौसर मुनीर ने लिखा है सुनकर फील गुड कराता है। और आगे फिल्म देखने के लिए कम्फर्ट जोन में ले जाता है। अक्षय ने अरुणाचलम मुरुगन्नाथम की किरदार को पूरी ईमानदारी से निभाया है जिन्होंने सैनेटरी नैपकिन बनाने की सस्ती मशीन बना डाली। लड़कियों को किस तरह से पीरियड्स में हाइजीन का ध्यान रखना चाहिए। सैनेटरी नैपकिन की कितनी जरूरत है हमारे देश की लड़कियों को पूरी फिल्म में बिना लाग लपेट के दिखा दिया गया है। अक्षय का साथ निभाते हुए राधिका ने भी अपने एक्टिंग और इमोशन से दर्शकों को जोड़े रखा है यह फिल्म उनके करियर की ऊंची उड़ान साबित हो सकती है। हीरो एक लविंग हस्बैंड है जो अपनी बीवी को पीरियड्स में घर से बाहर रहता हुआ देख और हाइजीन का ख्याल नहीं रखता हुआ देख पैड बनाने की सोचने लगता है। फिल्म देखकर लड़कियां ऐसा सोचती है कि उन्हें भी ऐसा ही लविंग पति मिले तो सपनों की दुनिया से बाहर आ जाइये क्योंकि ढाई घंटे की रील फिल्म और 70 साल के रियल लाइफ में बहुत अंतर होता है। जिसे समझने की जरूरत है, फिलहाल चर्चा फ़िल्म पर ही करते है। बात फिल्म की स्क्रिप्ट की करें तो स्क्रिप्ट बिल्कुल सीधे और सपाट है कही कही डायलॉग अच्छे है जो फिल्म को इंटरटेन करता है और बोरियत से दूर रखता है। अगर आप फैमिली के साथ भी फिल्म देखने जाये तो सहजता से फ़िल्म को देख सकते है क्योंकि पूरी फिल्म में कही भी अश्लीलता को नहीं परोसा गया है। सहज और सपाट तरीके से पूरी फिल्म को प्रस्तुत किया गया है।फिल्म में आपको आगे की कहानी का प्रिडिक्शन होता रहेगा।आर.वालकी की फिल्म को इमोशनल टच के लिए जाना जाता है जिसमें वो सफल रहें है फिल्म में कही कही इमोशनल सीन आपको फ़िल्म की ओर जरूर खींचेगा।

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अरुणाचल में जब लड़कियों को पीरियड्स आते है तो उसे सेलिब्रेट किया जाता है। यह फिल्म में अच्छा मैसेज है। जो एक नारी को नारी होने का एहसास कराता है।

सोनम कपूर की फिल्म में इंट्री वहाँ होती है जहाँ सीन में जरूरत है। जब सोनम कपूर अक्षय को सच का आईना दिखाती है कि 50 करोड़ महिलाओं में सिर्फ 12% महिलाएं ही सैनेटरी पैड का इस्तेमाल कर पाती है ये बाते आपको थियेटर से निकलने के बाद भी परेशान करेगी जैसे मैं परेशान हो गयी थी खुद की सेल्फी तक नहीं ले पायी।

अब बात करते है असली समस्या की क्या यह फिल्म पीरियड्स टैबू को दूर कर दर्शकों की मानसिकता बदलने में कामयाब हो पाएगी।और सबसे बड़ा सवाल क्या अक्षय कुमार अपनी फिल्म की कमाई का कुछ हिस्सा उन पचास करोड़ महिलाओं पर खर्च करना चाहेंगे? जो इस जमाने में भी 88% सैनेटरी नैपकिन से दूर है।

क्या फिल्म के बाद सरकार सैनेटरी पैड को टैक्स फ्री करेगी जिससे ज्यादा से ज्यादा लड़कियों तक इसकी पहुँच हो सके? इतने सीरियस इशू पर फिल्म आना एक सुखद अनुभव जरूर कराता है लेकिन भावनाओं की कश्ती पर सवार होकर जीवन की नइया पार नहीं की जा सकती। अभी भी इस पर काम करने की बहुत जरूरत है धीरे-धीरे ही सही बदलाव की बयार देखने को मिल रहा है जो अच्छी बात है।

हां इस बात की खुशी मुझे जरूर है फिल्म के ही बहाने सही मैं अपने घर वालों से दोस्तों से आसानी से इस टॉपिक पर बात कर पा रही हूं। सही मायने में यह फिल्म पीरियड्स टैबू को चिढ़ाती हुई लगती है।

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