जीवन के प्रति राग और उत्साह के कवि थे पं0 रामदेव झा 

 

जयंती पर साहित्य सम्मेलन में दी गई पुष्पांजलि 

पटना*(बिहार) हिन्दी काव्यसाहित्य में मूल्यवान अवदान देनेवाले पिछली पीढ़ी के चर्चित सुकवि पं रामदेव झा जीवन के प्रति निस्सीम राग और अकुंठ उत्साह के आदरणीय कवि थे। प्रेमकरुणा और आस्था उनके कवि का मूल तत्त्व था। वे हिन्दी के समर्पित सेवक और ध्वजवाहक थे। नगर में सदैव साहित्यिक जागरण में लिप्त रहा करते थे। उन्होंने अपने प्रियकविमहाकवि जयशंकर प्रसाद की स्मृति में, ‘प्रसाद साहित्य परिषद‘ नामक एक संस्था की स्थापना करउसके माध्यम से प्रायः ही साहित्यिकगोष्ठियाँ किया करते थे। जलता है दीपक‘ नामक उनकी काव्यरचना बहुत हीं लोकप्रिय हुई थीजिसमें जीवन के प्रति उनकी विराट दृष्टि और मंगलभाव की प्रांजल अभिव्यक्ति मिलती है।

यह बातें गुरुवार की संध्या साहित्य सम्मेलन में आयोजित जयंती समारोह मेंपं० झा के चित्र पर माल्यार्पण के पश्चात अपने उद्गार मेंसम्मेलन अध्यक्ष डा0 अनिल सुलभ ने कहीं। डा० सुलभ ने कहा कि पं0 झा साहित्य में खेमावंदी से सदासर्वदा दूर रहे। उनका स्वाभिमानीकवि सदा ही याचना‘ के स्थान पर साधना के पक्ष में खड़ा रहा। अपनी एक काव्यरचना में इसकी अभिव्यक्ति देते हुए उन्होंने कहा– “वरदान चाहने वाला मनपूजा करमत वरदान माँग। साधना न फिरती है दरदरप्रार्थना न होती है सब घर/साधना प्रार्थना करता जामत पूजा का प्रतिदान माँग।

पं0 झा के पुत्र राज किशोर झाकवयित्री डा० शालिनी पाण्डेयडा० विनय कुमार विष्णुपुरीडा० आर प्रवेशअमित कुमार सिंह तथा निशिकांत मिश्र ने भी सुकवि के चित्र पर पुष्पांजलि कर श्र्द्धांजलि दी।

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